कबीर दास कौन थे संत कबीर दास का जीवन परिचय

कबीर दास कौन थे कबीर दास का जीवन परिचय

हर धर्म हर देश और हर संस्कृति में कभी ना कभी ऐसे समाज सुधारक व ऐसे अच्छे इंसान पैदा होते हैं जो कि धरती पर सिर्फ अच्छे काम के लिए ही जन्म लेते हैं और वे अपना पूरा जीवन काल अच्छे कामों और समाज के हित में कार्य करने में ही लगा देते हैं ऐसा ही हमारे देश में भी हुआ है हमारे देश में भी बहुत सारे ऐसे समाज सुधारक व ऐसे महान संत, महात्मा, ऋषि, मुनि और साधुओं ने जन्म लिया है.

जिन्होंने भारत के लिए बहुत सारे अच्छे अच्छे कार्य किए और उन्होंने भारत के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया इसीलिए हमारे देश में इन सभी महान इंसानों को याद भी किया जाता है और सभी लोग इनके बताए गए मार्ग पर चलने की कोशिश करते हैं हमारे देश में कई ऐसे भक्त भी पैदा हुए हैं जिन्होंने भक्त और भगवान के बीच संबंधों को दर्शाया.

उन्होंने भक्त और भगवान के रिश्तो को दूसरे लोगों को समझाने की कोशिश की इन्हीं में से एक ऐसे ही कवि साधु या समाज सुधारक कबीर दास भी थे कबीर दास का नाम सुनते ही आप सभी के मन में सबसे पहले उनके दोहे और पद जरूर याद आएंगे क्योंकि संत कबीर दास ने अपने जीवन में बहुत सारे दोहे पद वह भक्ति गीत लिखे जो कि आज भी हमारे दिलों के ऊपर राज करते हैं.

आप सभी ने संत कबीर दास के बारे में बहुत सुना होगा या उनके बारे में पढ़ा भी होगा क्योंकि संत कबीर दास के दोहे पद व उनकी भक्ति की बातें हर हिंदी पुस्तक में की जाती है लेकिन बहुत सारे लोगों को संत कबीर दास की जीवन काल और उनके जीवन परिचय के बारे में इतना ज्यादा जानकारी नहीं है तो इस ब्लॉग में हम आपको संत कबीर दास के पूरे जीवन काल और उनके जीवन परिचय के बारे में विस्तार से बताने वाले हैं.

कबीर दास का जीवन परिचय

कबीर दास एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने अपने पूरे जीवन में हमेशा समाज को सुधारने के कार्य किए उन्होंने समाज की हर एक बुराई के ऊपर अपनी कलम चलाई कबीर दास ने अपने दोहों और पदों व के जरिए समाज की बुराई को खत्म करने और जातिवाद व ऊंच-नीच, भेदभाव करने वाले लोगों को जागरूक करने की कोशिश की संत कबीर दास अपने आपको एक साधारण इंसान समझते हैं.

वे हिंदी भाषा के बहुत बड़े ज्ञानी थे उन्होंने अपने पदों और दोहों की मदद से दूसरे लोगों के दिलों के ऊपर भी राज किया संत कबीर दास के दोहे हमें कई भाषाओं में देखने को मिल जाते हैं लेकिन उनका ज्यादातर प्रभाव हिंदी भाषा के ऊपर ही रहता था संत कबीर दास के दोहे व मुख्य रूप से पंजाबी, हरियाणवी, राजस्थानी, अवधी, ब्रज व खड़ी बोली में देखने को मिलते हैं.

उन्होंने अपने दोहों और पदों में हमेशा सकारात्मक विचारों का प्रयोग किया एक संत कबीर दास हिंदी भाषा के एक बहुत बड़े महाकवि विचारक भक्ति काल के प्रमुख कवि माने जाते हैं और इसके साथ ही वे एक बहुत बड़ी समाज सुधारक भी थे उन्होंने अपने पद से समाज को एक नई दिशा दी कबीर दास ने अपने जीवन में हमेशा हिंदी भाषा को समृद्ध बनाने की कोशिश की वे हमेशा लोगों को सकारात्मक और अच्छे मार्ग पर चलने के लिए जागरूक करते थे.

संत कबीर दास ने अपने दोहों और पदों की मदद से समाज में बहुत बदलाव लाया और अगर कोई भी इंसान उनके दोहों और पदों को पढता है तो वह उनका मनमुग्ध हो जाता है आपने भी बहुत सारी हिंदी पुस्तकों में संत कबीर दास के दोहे और पद जरूर पढ़े होंगे और उनके भक्ति काल संगीत आज भी हमारे कानों में गूंजते हैं संत कबीर दास अपनी महिमा मंडल के जरिए समाज में भेदभाव को खत्म करना चाहते थे

कबीर दास की रचनाएं

कबीर दास ने अपने जीवन में कई अलग अलग विषयों के ऊपर भी कलम चलाई जिससे वे समाज में फैल रही बुराई, भेदभाव और जातिवाद जैसी बीमारियों को खत्म कर सके क्योंकि जिस समय कबीरदास का जन्म हुआ था उस समय जातिवाद का बहुत ज्यादा मसला था और जातिवाद का मामला बहुत तेजी से फैलता जा रहा था इसके अलावा कबीरदास ने अपने जीवन में बहुत सारी रचनाएं की जिसमें सखियां, भक्ति, भजन, हिंदी ग़ज़ल, कबीर वाणी दोहे पद जैसी चीजें देखने को मिलती है उनकी मुख्य मुख्य रचनाएं भी हैं.

जिनका नाम तीसा जंत्र,पुकार कबीर कृत, सननामा, शब्द राग काफी और राग फगुआ,अमर मूल,अक्षर खंड की रमैनी,अलिफ़ नामा,कबीर गोरख की गोष्ठी,उग्र गीता,अक्षर भेद की रमैनी,कबीर और धर्मंदास की गोष्ठी,कबीर की साखी,चौका पर की रमैनी,कबीर की वाणी, कबीर अष्टक, जन्म बोध,कर्म कांड की रमैनी,कबीर परिचय की साखी,काया पंजी,अर्जनाम कबीर का,उग्र ज्ञान मूल सिद्धांत- दश भाषा,अगाध मंगल,अनुराग सागर,आरती कबीर कृत,अठपहरा,चौतीसा कबीर का,छप्पय कबीर का,

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कबीर दास का जीवन परिचय

कबीर दास की जीवन कबीरदास के जन्म को लेकर लोगों में अलग-अलग राय है क्योंकि बहुत सारे लोगों का मानना है कि उनका पालन पोषण किसी और ने किया था और वह लहरतारा तालाब के पास मिले थे लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि उनका जन्म काशी के लहरतारा तालाब नामक स्थान पर हुआ था ऐसा माना जाता है कि संत कबीर दास का जन्म 1398 ईसवी में हुआ था .

उनके पिता का नाम नीरू और उनकी माता का नाम नीमा था जो कि एक पालक माता के नाम से जानी जाती है कबीर दास बचपन से ही पढ़ने लिखने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाते थे और उनका जन्म भी एक बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था.क्योंकि उनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था लेकिन उस ब्राह्मणी ने दुनिया की बदनामी के डर से कबीर दास को लहरतारा तालाब के पास फेंक दिया था.

इसीलिए उनके पालक माता पिता अलग माने जाते हैं संत कबीर दास को खेलने में भी ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी संत कबीर दास बिल्कुल भी पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन उनके द्वारा बोले गये दोहे पद भजन उनके शिष्यों ने लिखे थे.जब संत कबीरदास का जन्म हुआ उस समय जातिवाद का मसला बहुत ज्यादा फैला हुआ था इसीलिए संत कबीर दास को शुरुआती शिक्षा लेने में भी परेशानी आई.

क्योंकि जब संत कबीर दास शिक्षा लेने के लायक हुए तो वे काशी के ही प्रसिद्ध पंडित रामानंद के पास जाते हैं लेकिन रामानंद ने उनको जातिवाद का मसला देखते हुए वहां से भगा दिया इस बात से संत कबीर दास बहुत आहत हुए इसीलिए उन्होंने दिमाग लगाया और एक बार वे रात के समय में रामानंद के पास जाते हैं क्योंकि रामानंद हर रोज सुबह तालाब में स्नान के लिए जाते थे.

वहीं पर कबीरदास उनके रास्ते में लेट जाते हैं और अचानक से रामानंद का पाव कबीरदास से लगता है और फिर भी कहते हैं.राम-राम और यहीं से संत कबीर दास ने उनको अपना गुरु माना और गुरु मंत्र के रूप में राम राम का नाम जपा और इसी दिलचस्पी को देखते हुए रामानंद भी संत कबीर दास को अपना शिष्य बना लेते हैं और यहीं से संत कबीर दास की जीवन की असली शुरुआत होती है.

रामानंद ने संत कबीर दास को बहुत सारी शिक्षा का ज्ञान दिया जिनमें उन्हें मुख्य रूप से उर्दू फारसी संस्कृति और हिंदी भाषा का भाषा के बारे में बताया और फिर कुछ समय पश्चात संत कबीर दास लोई नामक एक कन्या से शादी करते हैं जिनके दो बच्चे होते हैं जिनमें एक का नाम कमाल और लड़की का नाम कमाली था इसके बाद 1518 में संत कबीर दास का निधन हो जाता है संत कबीर दास ने अपने जीवन में बहुत सारी रचनाएं पद दोहे लिखे जो कि आज भी हमारे दिलों पर राज करते हैं.

कबीर दास के 10 दोहे

ऊँचे कुल कहा जनमिया, जे करनी ऊँच न होय।
सुबरन कलस सुरा भरा, साधू निंदा सोय॥

व्याख्या-इस साखी में कवि कहता है कि ऊँचे वंश में जन्म लेने का भी कोई लाभ नहीं है यदि हमारे काम ऊँचे नहीं हैं। क्योंकि यदि सोने का कलश मदिरा से भरा हो तो सज्जन उसकी भी निंदा ही करते हैं। केवल ऊँचे वंश में जन्म लेने से ही कोई महान् नहीं हो जाता उसे ऊँचा उसके महान् कार्य बनाते हैं।

काबा फिरि कासी भया, रामहिं भया रहीम।
मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम्॥

व्याख्या-कबीर कहते हैं कि चाहे मुसलमानों के पवित्र धार्मिक स्थल काबा में जाओ या हिंदुओं की धार्मिक नगरी काशी में ; चाहे उसे राम के नाम से ढूंढो या रहीम में-वह वास्तव में एक ही है। उसमें कोई भेद नहीं है। वह तो सार्वभौमिक सत्य है जो सब जगह एक-सा ही है। मनुष्य अपनी भिन्न सोच के कारण उसे अलग-अलग चाहे मानता रहे। मोटा आटा ही तो मैदे में बदलता है। उन दोनों में कोई मौलिक भेद नहीं है। हे मानव ! तू उन्हें बैठ कर बिना किसी भेद-भाव के खा ; अपना पेट भर। भाव है कि परमात्मा को चाहे कही भी ढूंढो और किसी भी नाम से पुकारो पर वास्तव में वह एक ही है।

हिंदू मुआ राम कहि, मुसलमान खुदाई।
कहै कबीर सो जीवता, जो दुहुँ के निकट न जाइ॥

व्याख्या-कबीर कहते हैं कि हिंदू और मुसलमान ईश्वर के वास्तविक सच को समझे बिना क्रमशः राम और अल्लाह शब्दों को दुराग्रहपूर्वक पकड़ कर डूब मरे। इस संसार में वह सावधान है जो इन दोनों के फैलाए धोखे के जाल में नहीं फंसता और सार्वभौमिक सत्यता को समझता है कि प्रत्येक प्राणी के हृदय में बसने वाला चेतन ही राम और अल्लाह है।

पखापखी के कारनै, सब जग रहा भुलान।
निरपख होइ के हरि भजै, सोई संत सुजान॥

व्याख्या-कबीर कहते हैं कि यह संसार पक्ष-विपक्ष के झगड़े में उलझ कर ईश्वर के नाम को भुला कर इससे दूर होता जा रहा है। उसके लिए तेरे-मेरे का भेद ही प्रमुख है। जो व्यक्ति निष्पक्ष होकर ईश्वर का नाम भजता है वही चतुर-ज्ञानी संत है। भाव यह है कि यह संसार तो झूठा है और इसे यहीं रह जाना है। इस संसार को छोड़ने के बाद मनुष्य के साथ यह नहीं जाएगा बल्कि उसकी भक्ति और सद्कर्म जाएँगे। इसलिए उसे ईश्वर के नाम की ओर उन्मुख होना चाहिए।

हस्ती चढ़िए ज्ञान को, सहज दुलीचा डारि।
स्वान रूप संसार है, भेंकन दे झख मारि॥

व्याख्या-कबीर कहते हैं कि हे मानव, तुम ज्ञान रूपी हाथी पर सहज स्वरूप स्थिति रूपी गलीचा डालो। यह संसार तो अज्ञानी है; यह तो कुत्ते के समान है जो व्यर्थ ही भौंकता रहता है। उसकी परवाह किए बिना तुम उसे व्यर्थ भौंक कर अपना समय बेकार करने दो और तुम भक्ति-मार्ग पर आगे बढ़ते जाओ।

प्रेमी हूँढ़त मैं फिरौं, प्रेमी मिले न कोई।
प्रेमी कौं प्रेमी मिलै, सब विष अमृत होई॥

व्याख्या-कबीर कहते हैं कि मैं परमात्मा के नाम से प्रेम करने वाला अपने जैसे किसी प्रभु के प्रेमी को खोज रहा हूँ पर मुझे कोई प्रभु-प्रेमी मिल नहीं रहा। जब एक भक्त को दूसरा भक्त मिल जाता है तो उसके लिए संसार की सभी विषय-वासनाएँ मिट जाती हैं। उनका विषय-वासना रूपी विष समाप्त हो जाता है तथा वे अमृत के समान हो जाती हैं। भाव है कि जब किसी प्रभु-प्रेमी को अपने जैसा प्रभु-प्रेमी मिल जाता है तो उन दोनों की प्रभु-भक्ति परिपक्व हो जाती है और फिर उन्हें माया से भरे संसार के प्रति कोई रुचि नहीं रह जाती।

मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं।
मुकुताफल मुकता चुगैं, अब उड़ि अनत न जाहिं।

व्याख्या-कबीर कहते हैं कि हृदय रूपी मान सरोवर जब भक्ति के जल से पूरी तरह भरा हुआ होता है तो हंस रूपी आत्माएं उसी में क्रीड़ाएं करती हैं। वे आनंद में भर कर मुक्ति रूपी मोतियों को वहाँ से चुगते हैं। वे उड़कर, विमुख होकर अब अन्य साधनाओं को नहीं अपनाना चाहतीं। भाव है कि परमात्मा के नाम में डूब जाने वाले भक्त स्वयं को भक्ति-भाव में ही लीन रखने के प्रयत्न करते हैं तथा सांसारिक विषय-वासनाओं से दूर ही रहते हैं।

F&Q

Question. कबीर दास का जन्म कब हुआ था?
Answer.विक्रमी संवत 1455 (सन 1398 ई०)

Question. कबीर दास का जन्म कहाँ हुआ था?
Answer.कबीर दास जी का जन्म वाराणसी के लहरतारा तालाब पर हुआ था।

Question. कबीर दास के गुरू का नाम क्या था?
Answer.कबीर दास के गुरू का नाम रामानंद था।

Question. कबीर दास का माता-पिता का नाम क्या था?
Answer.नीरू और नीमा

Question. कबीर दास की मृत्यु कब हुई थी?
Answer.कबीर दास जी की मृत्यु सन 1518 ई० में

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