दुनिया की 5 सबसे रहस्यमय जगह जिसके बारे में आप नहीं जानते

दुनिया की 5 सबसे रहस्यमय जगह जिसके बारे में आप नहीं जानते

दुनिया के सात अजूबों के बारे में तो बहुत से लोगों को पता है. लेकिन दुनिया में बहुत सी जगह ऐसी भी है. जो की बहुत ही खूबसूरत और हैरान कर देने वाली है. यह दुनिया  अजीबो गरीब और रहस्यमई चीजों से भरी हुई है इन नहीं चीजों के बारे में जानने की उत्सुकता हम सभी को होती है. ऐसे रहस्य जिनको सुलझा पाने में विज्ञान भी समर्थ नहीं है. आज इस पोस्ट में ऐसे ही 5 रहस्यमई चीजों के बारे में जानेंगे जिनको खोजे जाने के बाद से ही पूरी दुनिया को हैरान कृति रही है और इसके साथ ही जानेंगे वैज्ञानिक तर्कों को जिनके जिनसे रहस्यों को समझने में हमें थोड़ी सी मदद मिलेगी.

1. Nazca Line Peru

नाज़का लाइने अगर आप हवाई जहाज में किसी इलाके के ऊपर उड़ रहे हैं. और अचानक ही आपको धरती पर सैकड़ों मीटर में बने कुछ चित्र नजर आए तो हैरान होना लाजमी  बात है. 

पहली बार जब इन चित्रों को देखा गया था तो पूरी दुनिया हैरान रह गई.यह साफ नहीं  हो पाया कि इतने बड़े चित्रों के बनाने के पीछे क्या राज था यह चित्र किसी अनजान सी सभ्यता की अनूठी विरासत है. नाज़का लाइने यह लाइंस धरती पर बनी विशाल रेखा चित्र है. 80 किलोमीटर से ज्यादा फैले इलाके में ऐसे सैकड़ों चित्र है. इन लाइन  मैं  बंदर पक्षी और दूसरे जीवो के अलावा कई ज्यामितीय ईखाएं है.ट्रायंगल सुकेर और दूसरी  सरंचनाए शामिल है. लैटिन अमेरिका के पेरू में नाशखा मरुस्थल  में मौजूद ये सरंचनाए नाजका  संस्कृति की विरासत मानी जाती है. घी बनाने का समय ईसवी से 500 साल पहले  ईसवी से 500 साल बाद का माना जाता है इन लंबी लंबी पत्थरों की कतारों को जमीन से देखने पर सिवाय एक मकड़ी के जाल के अलावा कुछ नजर नहीं आता लेकिन ऊपर से देखने पर यही मकड़जाल कलाकारी का एक नमूना नजर आता है.  नाजका में  इन लाइन्स को देखने से दिमाग हैरत से सुन होने लगता है.

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सैकड़ों मीटर में फैली यह लाइंस आखिर किसने बनाई. और उन लोगों का इन्हें बनाने के पीछे क्या मकसद था क्या आज से 2500 साल पहले इंसान के पास इतनी टेक्नोलॉजी थी.जो  इन लाइन को इतना सटीक बना सके. क्योंकि धरती पर खड़े होकर देखने से इन लाइन्स के बारे में कुछ पता नहीं लगता. इनका पूरा पैटर्न आसमान से पूरी तरह नजर आता है. क्या उस सभ्यता के पास ऐसे साधन थे जो उन्हें आसमान में उड़ा सकते थे आइए जानने की कोशिश करते हैं इस खुद को सबसे ज्यादा पहचान जर्मन गणितज्ञ और पुरातत्त्ववेत्ता मारिया रीची की वजह से मिली जिन्होंने इन रेखाओं का गहराई से अध्ययन किया मकडी, छिपकली, मछली, शेर, शार्क ,और बंदर के अलावा हमिंग बर्ड भी साफ साफ पहचाने जाती है. इनमे  इंसान की आकृति बनी है. इंडिया का सबसे बड़ा चित्र 200 मीटर तक की लंबाई में फैला हुआ है.

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पहले तो यह माना गया था कि यह सचाई के लिए बनाई गई छोटी छोटी  नहरे या नालियां है. कुछ विद्वानों का मानना है कि यह चित्र धार्मिक संघर्ष से जुड़े हुए हैं और इनमे प्रकृति पूजा का चित्रण किया गया है. ऐसे ही कई  तरक के बारे में दिए गए हैं. तो आइए जानते हैं वे कौन-कौन से तर्क हैं एलियंस इंसानी फितरत है. कि जो चीज समझ में ना आए या तो उसे  पारलौकित ताकतों का नाम दे दो या फिर उसे एलियंस से जोड़ दो कुछ टीचर और किताब  चेरियट ऑफ गॉड एरिक  यह दलील दी है. की नाजका  के प्राचीन लोगों ने एलियंस के साथ मिलकर इन्हें बनाया था ताकि वह अपने उड़न तश्तरियां यहां उतार सके. यानी उनके हिसाब से धरती पर यह लाइनें कुछ और ना होकर एलियंस के एयरपोर्ट थे.

लेकिन इस  तर्क से एक और सवाल खड़ा हो जाता है. आखिर  पेरू के नाजका एलियंस आते क्यों थे . इस पर लोगों का दावा है. कि एलियंस धरती पर मौजूद खनिज धातुएं आदि के बारे में जानना चाहते थे ठीक वैसे ही जैसे हम मंगल ग्रह की जमीन के बारे में जानना चाहते हैं इसके लिए उन्हें पैरों के रेगिस्तान से बढ़िया जगह नहीं मिली जहां सालों से बारिश नहीं होती . जिसकी मिट्टी में लोहा और उसका ऑक्साइड मिलता है एलियंस को नाजका में बार-बार उतरना पड़ता था. इसलिए उन्होंने वहां पर अपना एयरपोर्ट बना लिया. अगर इस तर्क को मान भी लिया जाए. की एलियंस ने इस जगह का इस्तेमाल एयरपोर्ट के लिए किया था लेकिन इससे यह बात साफ नहीं होती कि उन्होंने इन लाइन्स को जानवरों और हर पक्षियों के पैटर्न में क्या बनाएं. एलियंस इन सीधे-सीधे पैटर्न में भी बना सकते थे. और यदि एलियंस धरती पर आते भेजिए तो इतने बड़े इलाके में एयरपोर्ट बनाने की बात कुछ खास नहीं लगती लेकिन फिर भी कुछ लोगों इन्हें एलियंस के द्वारा बनाई गई  लाइन्स ही मानते हैं.

लेकिन यदि इन लाइन्स एलियंस ने नहीं  तो इनको किस ने बनाया. क्योंकि आज से 2500 साल पहले तो इंसान का हवा में उड़ने का कोई प्रमाण नहीं मिलतातो वह बिना हवा में ऊंचाई इतनी सटीक लाइन कैसे बना सकते हैं.  तो इनको बनाने के पीछे कई मत प्रचलित हैं.  एक मान्यता इनके महत्व को दर्शाती है. हर  क्षेत्र के वैज्ञानिकों ने इन रेखाओ का अध्ययन किया और पाया कि नाजका  लोगों ने इसलिए बनाया था कि आसमान में रहने वाले देवता  उन्हें साफ-साफ देख सके लेकिन वह कभी भी पता नहीं चल पाया कि उनके देवता कौन थे. वहीं दूसरी मान्यता इन्हें खगोलीय पिंड  की स्थिति का अध्ययन और कैलेंडर के निर्माण से जोड़ते  है  इस तर्क के हिसाब से यह चित्र संपूर्ण वैद्यशाला के क्या काम करते थे . इन रेखाओं के जरिए सितारों की स्थिति बताई जाती थी ऐसा नामुमकिन भी नहीं है क्योंकि हर प्राचीन सभ्यता में इस तरह की वेधशाला मिली है जिनमें स्टोनहेंज प्रमुख है इन  तर्को से यह तो पता चलता है इन्हें  क्यों बनाया होगा लेकिन अभी तक हम यह नहीं जान पाए हैं कि इन्हें बनाया कैसे गया होगा लेकिन कुछ खोजकर्ताओं के पास इसका भी जवाब है इन आकृतियों को इनके सही पैटर्न में आकाश मार्ग या  रिमोट हाइट सही दिखा जा सकता है.

इस अनुमान की पुष्टि में वैज्ञानिक जिम गुडमैन  मैं एक गुब्बारे का निर्माण किया था जो आसमान में इतनी दूरी तक उड़ सकता था जहां से इन लाइन्स को साफ-साफ देखा जा सकता था. उनका मानना था कि इस तरह के गुब्बारे बनाने में ही यह  सभ्यता समर्थ हो सकती थी. लेकिन इंसानी दस्तावेज में काल में ऐसे किसी को बारे का कोई प्रमाण नहीं मिलता है लेकिन कुछ वैज्ञानिक मानते हैं की  इस सभ्यता के पास मैथमेटिक्स और जियोमेट्रिक का इतना ज्ञान था कि वह धरती पर रहकर ही इतनी बड़ी  रेखाएं बनाने में समर्थ थे इसमें   बिना किसी अंतरिक्ष यान और बिना किसी हवाई सर्वेक्षण की इतनी बड़ी रेखाएं  बनाना  सच में हैरान कर देने वाला था लगभग 80 साल से इनका रहस्य ऐसे ही बरकरार है. हजारों की संख्या में बने चित्र यह तो बताते हैं इनके पीछे कोई ना कोई मकसद तो जरूर रहा होगा. इन चित्रों का मकसद जो भी रहा हो लेकिन इन चित्रों देखकर एक बार जरूर मन में आती है जाने वो कैसे लोग थे.

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2. डेथ वैली के खिसकते पत्थर

आपने अमेरिका के गर्म इलाके डेथ वैली के बारे में तो सुना ही होगा लेकिन क्या आपको पता है इस के कई इलाकों में पत्थर के अपने आप खिसकने की घटना बहुत आम है इन  पत्थरों में कुछ पत्थरों का वजन तो कई टन तक है यह पत्थर अपने आप आगे चलते हैं जिसके कारण इसके चलने का निशान  पीछे छूटता जाता है डेथ वैली में रहस्यमय ढंग से खिसकने वाले पत्थरों को देखा गया है इन पत्थरों में कई का वजन तो 115 किलोग्राम तक है. बिना किसी मदद के पत्थर  आश्चर्यजनक रूप से इस घाटी की सतह पर अपने आप एकदम सीधी लाइन में चलते हैं.

Wandering Rocks Usa Stones Wind Death Valley
Wandering Rocks Usa Stones Wind Death Valley

वजन में भारी होने के बावजूद भी यह पत्थर सैकड़ों फीट तक करते हुए देखे गए हैं  पत्थरों का अपने आप सरकना दुनियाभर में वैज्ञानिकों का अध्ययन बना हुआ है. डेथ वैली उत्तरी अमेरिका का सबसे सूखा गरम और  रहस्यमई इलाका है. यह कैलिफ़ोर्निया दक्षिण पूर्व में  नवेडा  राज्य की सीमा के पास है इसकी लंबाई 225 किलोमीटर है कई वैज्ञानिक का  मानना की तेज हवा और बर्फीली सतह पर होने वाले  हलचल की वजह से होता है.  हालांकि वैज्ञानिकों की इस मान्यता से परे पत्थर अलग अलग दिशाओं में अलग-अलग  रफ्तार  से चलते हैं सकते हुए यह पत्थर अपने पीछे छूट जाते हैं जिसके कारण इनके सरकने का पता चलता है.

यह भी माना जाता है यह पत्थर साल में सिर्फ एक या दो बार ही   चलते हैं लेकिन इन्हें आज तक किसी ने  चलते हुए नहीं देखा है. सिर्फ इनके पीछे छोड़ी गई रेखाओं की वजह से ही उनके खिसकने का पता चलता है इस बारे में की गई कई वैज्ञानिक हो बताते हैं कि  रेगिस्तान में 90 मील प्रति घंटे की रफ्तार से  चलने वाली हवाएं रात को जलने वाली बर्फ और  सतह पर गीली मिट्टी यह सब मिलकर पत्थर को गतिमान करते होगे जबकि कुछ का मानना यह है कि जैसे-जैसे तापमान कम होता है वैसे ही पत्थर से लिखने शुरू हो जाते है.

क्योंकि सतह के नीचे उठने वाले पानी और ऊपर  चलने वाली हवा से पत्थर  खिसकने लगते हैं फोटोग्राफर माइकल बैरन ने यहां  पत्थरों की हलचल को देखने के लिए कई साल बिताएं.डेली टेलीग्राफ में दिए गए इंटरव्यू में बैरन ने बताया की रेगिस्तान में अपने आप चलने वाले पत्थर आदमी के  वजन जितने भारी हैं. इतने भारी पत्थरों का बिना किसी फोर्स के आगे खिसकना लगभग नामुमकिन है. उनके मुताबिक यह पहली आज तक ही अनसुलझी है. इसके पीछे दिए गए  वैज्ञानिक तर्क भी आज तक इसकी सही सही नहीं पता.

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3. Easter Island

Easter Island स्थानीय भाषा में रापा नुई  कहलाने वाले इस टापू  पर एक ही पत्थर से गई विशालकाय इंसानी मूर्तियां जगह जगह बिखरी हुई हैं जिन्हें मोई कहा जाता है . Easter द्वीप पर अलग-अलग जगहों पर करीब 800 से ज्यादा बड़ी मूर्तियां प्रसिद्ध है  जिन्हें  रापा नुई लोगों ने बनाया था इनमें से सबसे बड़ी मूर्ति  33 फीट ऊंची और इंच 75 टन वजनी है यह मूर्ति और लगभग 1200 साल पुरानी मानी जाती है प्रशांत महासागर में  सबसे दूर मौजूद Easter द्वीप पर दुनिया की सबसे पुरानी विशाल मूर्तियां अब तक की सबसे आश्चर्य से भरपूर मूर्तियां है यह मूर्तियां किसने बनाई और क्यों बनाई भजन में 75% मूर्तियां किसने बनाई होगी इन सभी सवालों को लेकर दुनिया में अलग-अलग मान्यताएं है .लेकिन अभी तक इसके पीछे की ठोस अब तक किसी को नहीं पता. प्रशांत महासागर से 15 मील दूर समुंद्री चट्टानों के बीच छिपे इस टापू पर  कभी प्राचीन समय में polygyny लोग रहते थे

इस वीरान टापू पर 7 मीटर तक  ऊँची विशाल इंसानी मूर्तियां  के लिए यह भी कहा जाता है. उनका निर्माण किसी पुरानी मानव सभ्यता के लिए करना असंभव लगता है .इस टापू के बारे में सबसे पहली जानकारी डच एडमिरल याकूब रोगेवीन द्वारा सन 1722 में मिली जब रोगेवीन तीन जहाजों के साथ इस टापू  पर पहुंचा तुमसे दूर से ही टापू  पर विशालकाल इंसानी  आकृति दिखाई पड़ी नजदीक जाकर देखने पर पता चला कियह कोई जिंदा इंसान नही बल्कि पत्थर से बनी  विशाल मूर्ति है.

उस बड़ी मूर्ति के साथ उसी के जैसी पत्थर से बनी मूर्तियों की पूरी सेना थी उस दिन ईस्टर संडे था इसलिए इस टापू का नाम ईस्टर द्वीप रख दिया  जानकारों के अनुसार यह पत्थर की आकृतियां  ज्वालामुखी के दोरान बनी विशालकाय चट्टानों को तराश कर बनाई गई थी इस टापू के सोए हुए ज्वालामुखी के मुहाने के आस-पास बड़े-बड़े पत्थरों के टुकड़े देखे जा सकते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इन्हें  ज्वालामुखी के मोहने की दीवार से तोड़कर   इकट्ठा किया गया थाइनमें से कितने टुकड़े मूर्ति की शक्ल में गड़े हुए हैं. और कितने ही बिना पड़े हुए पड़े हैं .लगभग 400 से ज्यादा मूर्तियां अधिक तराशी हुई है. जो ज्वालामुखी के मुहाने के अंदर अब भी पड़ी है. इनमें से कई मूर्तियां ऐसी भी है. जीने का बाहर लाना ही रह गया था लेकिन वह किसी वजह से ऐसे ही छोड़ दी गई अब सवाल यह उठता है. कि इस टापू पर बनी इन मूर्तियों की सेना बनाने के पीछे उन लोगों का क्या मकसद था और यह लोग अचानक इस काम को  रोककर कहां चले गए क्या भी इंसान ही थे जिन्होंने इतने कठिन काम को अंजाम दिया था

आइये इसके पीछे दिए गए तर्कों को जानने की कोशिश करते हैं. सबसे पहला और प्रचलित तर्क यह है. कि इन विशालकाय मूर्तियों को एलियंस ने बनाया था कई टीवी चैनल्स और दूसरे दस्तावेजों के हिसाब से इन मूर्तियों को हजारों साल पहले एलियंस ने बनाया था क्योंकि इसमें समय पहले इंसान इतनी कठिन काम को अंजाम नहीं दे सकता था और ना ही उनके पास ऐसी मशीनें थी जो इतने बड़े भारी पत्थरों को उठाकर इधर-उधर ले जा सके लेकिन इस तर्क में कोई भी दम नहीं है. क्योंकि एलियंस क्यों करेगे क्यों इतने बड़े-बड़े पत्थरों की मूर्तियां बनाकर फिर उन्हें ऐसा ही छोड़ देंगे और ना ही इस बात से इन को बनाने का मकसद साफ हो पाता है.

तो आखिरकार इन मूर्तियों को बनाया किसने था यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के एक डॉक्टर  इस देवी पर मूर्तियां का रहस्य खोजते हुए इसी टापू पुना  पाव  ज्वालामुखी मोहाने के पास पहुंच गए ठंडे ज्वालामुखी के अंदर छुपी हुई एक खदान थी और उन्हें यहां पर मूर्ति बनाने की कई अवशेष मिले यहीं पर उन्हें डलवा धातु की बनी हुई 7 इंच लंबी कुल्हाड़ी मिली और दूसरे ओजरो मिले जिससे यह साफ हो पाया कि उस समय में वहां पर रही आदिवासी सभ्यता ने बनाया था आगे खुद करने पर ही है. आगे खोज करने पर पता चला की यह मूर्तियां आदिवासियों के धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा थी इस तरफ से यह साफ हो जाता है. कि मोई मूर्तियो  के बनाने का सरे इंसान को ही मिलना चाहिए ना कि दूसरे ग्रहों से आने वाले एलियंस को.

इन बातों से यह तो पता चलता है. कि इन्हें किसने और क्यों बनाया था पर सबसे बड़ा सवाल अब भी वैसा ही है. खोजकर्ताओं को जिस बात नहीं है. सबसे ज्यादा परेशान किया वह यह था कि इतनी विशाल मूर्तियों को इतनी दूर लाया कैसे गया हम इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं लगा पा रहे हैं की उस प्राचीन समय में साधनों की कमी के  बावजूद इतनी बड़ी बड़ी मूर्तियों को  जहां बनाया गया था वहा से करीब 10 मील जितनी दुरी तक कैसे लाया होगा.एक मत के हिसाब से लकड़ी के मोटे-मोटे लठ्ठो की वजह से किया गया होगा.

लेकिन टापू की मिट्टी के परीक्षण से जो बात मिलती है. उसके हिसाब से वह मिट्टी इतने बड़े पेड़ों को खड़ा रख पाने में समर्थ नहीं है .जितने बड़े पेड़ इस काम के लिए जरूरी थी एक दूसरा विचार पेड़ पौधों से बने रस्सो का पक्ष रखता है. लेकिन 75 टन तक वजन इन रसो से खींच पाना संभव नहीं लगता इन्हें बना कर इतनी दूर कैसे लाया गया और फिर उस सभ्यता का क्या हुआ जिन्होंने इन्हें बनाया आखिर वे सभ्यताएं इन मूर्तियों को बनाकर कहां गायब हो गई ऐसी बातें हैं. जिनके पहेली को आज तक कोई नहीं सुलझा पाया शायद भविष्य में हमें ऐसे प्रमाण मिल सकेंगे जिन चाहिए पहली सुलझ जाए.

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4. नरक का दरवाजा Door to Hell

Door to Hell ya नरक का दरवाजा क्योंकि तुर्कमेनिस्तान के दरवेजे गांव स्थित है. धरती में बना एक गड्ढा और उस गड्ढे में धधकती आग यह आग पिछले 50 साल से ऐसे ही चल रही है. दुनिया इसे नर्क के दरवाजे के नाम से जानती है. कागा  करम रेगिस्तान में बना यह विशाल गड्ढादरअसल जमीन के अंदर प्राकृतिक गैस के विस्फोट से बना था 1971 में पूर्व सोवियत के वैज्ञानिक इस डजट एरिया में तेल और गैस की खोज करने आए थे उन्होंने द्र्वेजे  गांव में स्थित इस जगह को चुना ड्रिलिंग के लिए चुना लेकिन ड्रिलिंग शुरू करने के कुछ समय बाद ही यह जगह ढह गई और यहां 230 फीट चौड़ा 65 फीट गहरा क्रेटर बन गया.

इस दुर्घटना में कोई जनहानि तो नहीं हुई लेकिन इस क्रेटर से बहुत ज्यादा मात्रा में मीथेन गैस निकलने लगी इसलिए इस मिशन गैस को बाहर निकलने से रोकना जरूरी था इसके लिए वैज्ञानिकों के पास दो विकल्प थे या तो इस क्रेटर को बंद कर दिया जाए या इस मीथेन गैस को जला दिया जाए.पहला तरीका बहुत ही खर्चीला और समय लगने वाला था इसलिए वैज्ञानिकों ने दूसरा तरीका अपनाया और इस क्रेटर में आग लगा दी उनका सोचना था कि कुछ ही दिन में सारी मीथेन गैस जल जाएगी. और और आज अपने आप ही बुझ जाएगी लेकिन विज्ञानिकों का यह अंदाजा बिल्कुल गलत निकला. तब से आज तक आग से धधक कर रहा है. इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं. कि उस जगह मीथेन गैस का कितना बड़ा भंडार है. हर साल लाखों सेनानी से देखने आते हैं. डोर टू हेल कोई राज तो नहीं है. फिर भी वैज्ञानिकों के लिए यह  रहस्य जरूर है. कि लगभग 50 साल से   धधक कर रही यह आग कब भुजेगी.

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5. Giant Stones Of Costa Rica

कुछ पत्थर हैं उन पत्थरों को सबसे पहले 1930 में जंगल में सफाई के दौरान कुछ सफाई कर्मचारियों ने देखा था हैरत की बात यह थी कि इन पत्थरों को उनसे पहले किसी ने नहीं देखा था और दूसरा यह था कि उनका हैरतअंगेज तरीके से  गोल होना यह पत्थर इतने गोल है कि धरती पर उनके जैसे गोल पत्थर कहीं पर भी नहीं मिलते यह पत्थर 2 सेंटीमीटर से लेकर 2 मीटर के व्यास जितने हैं और 15 टन तक वजनी है.

लेकिन माना जाता है कि आज से करीब 1500 साल पहले बनाया गया होगा इनके इतने गोल आकार ने वैज्ञानिकों को परेशानी में डाल रखा है. जिनके  कारण कई टीम पिछले कई सालों  से इन पर शोध कर रही हैं इन पत्थरों के बारे में वहां पर कई अफवाहें मशहूर है. कुछ लोगों का कहना है . यह पत्थर हजार साल पहले समुंदर में  डूबी अंटार्कटिक  सभ्यता के क्या सबूत है. तो कुछ का कहना है की प्रकृति ने उन्हें इसी तरह से बनाया होगा जबकि कुछ लोगों का कहना है. कि इनको बनाने वाले सभ्यता के पास ऐसी तकनीकी थी.

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जिससे वह पत्थर को पिघला कर किसी भी आकार में डाल सकते थे अफवाह चाहे जो भी हो लेकिन इनको बनाने के पीछे इनकी ठोस वजह का तक नहीं पता चल सका है.किसी को भी नहीं पता कि इन को किसने और क्यों बनाया वहां के स्थानीय निवाशियो  का मानना है. शायद उस दौरान लोगों ने दिव्य शक्तियों को मनाने के लिए रखें होंगे यह हो सकता है. इन पत्थरों से उन्होंने अपने राज्य की सीमा बनाई हो लेकिन सच क्या है. यह आज तक किसी को नहीं पता कुछ लोगों का मानना है. कि इनके अंदर सोना छिपा हुआ हो सकता है. लेकिन जब इन्हें बारुद से उड़ाया गया तो यह बिल्कुल खाली निकले.

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